भाव प्रतिकमण

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 जय जिनेन्द्र । आज़ के युग में हम को कई बार प्रतिकमन करने का वक्त नहीं मिलता ऐसे में हम फोन पर या इन तीन पेज का प्रिंट निकलकर 24 घंटे में से मात्र 10 मिनट निकल कर भाव प्रतिक्रमण कर सकते है और प्रभु के जैसे भाव प्राप्त करने की प्रार्थना और अपने कर्मो को निर्जरा कर सकते है । भाव प्रतिकमण हमने केवल पोस्ट किया है इसका लेखन हमने नही किया है इसलिए कोई भूल हुई हो तो मिछामी दुक्कडम - यश लोढ़ा, चंद्रपुर , महाराष्ट्र

शासनपति श्री महावीर स्वामीजी आपसे भाव प्रतिक्रमण ठाने की आज्ञा लेता/ लेती हूं वर्तमान के अरिहंत श्री सिमंधर स्वामीजी तथा गुरु गुरुणिजी म.सा.आपसे भाव प्रतिक्रमण ठाने की आज्ञा लेती हूं

तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेमि वंदामि नमसामि सक्कारेमी सम्माणेमी कल्याणं मंगलं देवियं चेइयं पज्जुवासमि मत्थएणं वंदामि ॥

णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं, णमो आयरियाणं, एसो पंच णमोक्कारो, सव्व पाव-प्पणासणो। मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं ॥

भाव प्रतिक्रमण

१. अहो परम कृपालु गुरुदेव ! बीस तीर्थंकर प्रभुजी तथा अनंत सिद्ध प्रभुजी मेरी आत्मा का स्वरुप है अनाहारक (अर्थात् आहार-रहित) तो भी मेरी आत्मा ने सचित अचित और मिश्र आहार करके, चिकने गाढ़े कर्म इस भव आश्री परभव आश्री, अनंत भव आश्री उपार्जित किये है। जिस दिन आपके जैसा अनाहारक स्वरुप प्रगट करूंगा, वह दिन मेरा धन्य होगा।


2) बीस तीर्थकर प्रभुजी मेरी आत्मा का स्परूप है। अनारंभी (आरंभ और परिग्रह से रहित) तो भी मेरी आत्मा ने संरभ, समारंभ और आरंभ किया कराया व अनुमोदन कर चिकने गाढे कर्म इस भव आश्री, पराभव आश्री अनंता भव आश्री, उपार्जित किये है। ऐसी मेरी दुष्ट आत्मा को करोड़ वार धिक्कार कर आप जैसा अनारंभी स्वरूप प्रगट करने की मुझे भव भव में शक्ति दो जिस दिन आप जैसा अनारभी स्वरूप प्रगट करूंगी। वह दिन मेरा धन्य होगा।


3) महाविदेह क्षेत्र में विराजित वीस तीर्थंकर प्रभुजी मेरी आत्मा का स्वरूप है, अकषायी (क्रोध रहित) तो भी मेरी आत्मा ने विभाव दशा में आकर क्रोध कषाय, मान-कषाय, माया-कपाय और लोभ-कषाय का सेवन कर राग द्वेष के द्वारा चिकने गाढे कर्म इस भव आश्री, परभव आश्री, अनंत भव आश्री उपार्जित किये है, जिस दिन आप जैसा निश्चय क्षमा का गुण प्रगट होगा, वह दिन मेरा धन्य होगा।


4) बीस तीर्थकर प्रभुजी मेरी आत्मा का स्वरूप है, अहिंसक, तो भी मेरी आत्मा ने त्रस जीव (वेइंद्रिय, तेइंद्रिय, चउरेंद्रिय, पंचेद्रिय) और स्थावर जीव का (पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु और वनस्पति) मेरे शरीर के पोषण के लिये, मेरी आत्मा ने एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय तक के भव में, जहाँ जहाँ जन्म मरण किया, वहाँ वहाँ सभी जीवों का हनन किया है, ऐसी मेरी दुष्ट आत्मा को करोड़ बार धिक्कार, अनंत भव में किसी भी जीव की दया नहीं पाली, आपके जैसा अहिंसक स्वरूप प्रगट होगा वह दिन मेरा धन्य होगा।

5) बीस तीर्थंकर प्रभुजी मेरी आत्मा का स्वरूप है, अभाषक (मौन) तो भी मेरी आत्मा ने कर्कशकारी (के कर के प्रहार जैसा), कठोरकारी (पत्थर के प्रहार जैसा), छेदकारी (तलवार के प्रहार जैसा), भेदकारी (भाले के प्रहार जैसा), वैरकारी, विरोधकारी, निश्चयकारी. सावद्यकारी और पर को पीडाकारी भाषा बोली । इस भव आश्री, परभव आश्री, अनंता भव आश्री चिकने गाढे कर्म उपार्जित किये है। ऐसी मेरी दुष्ट आत्मा को करोड़ बार धिक्कार धिक्कार कर, आप जैसा अभाषक स्वरूप प्रगट होगा, वह दिन मेरा धन्य होगा।


6) बीस तीर्थंकर प्रभुजी मेरी आत्मा का स्वरूप है अचौर्य (चोरी रहित) तो भी मेरी आत्मा ने जीव अदत्त, स्वामी अदत्त, तीर्थंकर अदत्त और गुरू अदत्त, चोरी की कराई, अनुमोदन करके चिकने गाढे कर्म उपार्जित किये ऐसी मेरी दुष्ट आत्मा को करोड़ वार धिक्कार धिक्कार आपके जैसा अचौर्य, स्वरूप प्रगट करने की मुझे शक्ति दो ।


7) बीस तीर्थंकर प्रभुजी मेरी आत्मा का स्वरूप है। अवेदी तो भी मेरी आत्मा ने पुरूष वेद में, स्त्री वेद में, नपुंसक वेद में, कुदृष्टि से पोषक से खुराक से और भाषा से अब्रह्म का सेवन मन वचन काया के योग से किया हो कराया हो अनुमोदन किया हो उससे चिकने गाढे कर्म उपार्जित किये। ऐसी मेरी दुष्ट आत्मा को करोड़बार धिक्कार, आपके जैसा अवेदी, निर्विकारी स्वरूप प्रगट करने की मुझे भवभव में शक्ति दो । मेरी आत्मा का अवेदी स्वरूप प्रगट होगा वह दिन मेरा धन्य होगा।


8) बीस तीर्थंकर प्रभुजी मेरी आत्मा का स्वरूप है, अपरिग्रह तो भी मेरी आत्मा ने सचित, अचित और परिग्रह इकट्ठा किया कराया अनुमोदन किया। ऐसी मेरी दुष्ट आत्मा को करोड़बार धिक्कार, नौ प्रकार का बाह्य परिग्रह और चौदह प्रकार का अभ्यंतर परिग्रह छोड़ने की मुझे शक्ति दो ।


9) अठारह प्रकार के पाप, सात प्रकार के कुव्यसन, पचीस प्रकार के मिथ्यात्व, चौदह प्रकार के समुच्छिम जीव तथा आर्तध्यापन रौद्रध्यान संबंधी किसी प्रकार का पाप दोष लगा हो तो अरिहंत सिद्ध केवली गुरूदेव और आत्मा की साक्षी से मिच्छामी दुकडम।


10) 84 लाख जीव योनी के जीवों को चालते, हालते, उठते, बैठते, जानते, अजानते, कोई जीव को छेदा हो, भेदा हो, परिताप, किलामणा उपजाई हो तो तस्स मिच्छामि दुक्कडम ।


11) मैं जगत के सभी जीवों को खमाता हूँ, जगत के सभी जीव मेरे दोष माफ करे, सभी जीवों के साथ मेरी मित्रता हो, किसी जीव के साथ मेरा वैर नहीं है।


12) जगत के सभी जीव सुखी होवे, जगत के सभी जीव निरोगी बने, जगत के सभी आत्माओं का कल्याण हो, जगत के सभी जीव दुःखों से मुक्त बने, सभी जीवों को शासन रसिक कब बनाऊं ऐसी भावना मेरे मन में उमड़कर आवे।


अहो परम कृपालु गुरुदेव । इस भव, परभव, भवों भव के लिये आपका शरणा अंगीकार करते हैं. आपके शरण में आने से, आपकी स्तुति, भक्ति और गुण-कीर्तन करने से हमारा उपयोग आपके गुणों में प्रवर्तन करने से आप जैसे उज्जवल, निर्मल, निर्दोष और निर्विकार बन सकेंगे।


हमारे मन वचन काया से हमारी अनादि काल की कुबुद्धि, कुदेव तथा कुसंस्कार सभी नष्ट होंगे तथा आपके जैसे सुबुद्धि सुदेव एवं सुसंस्कार प्रगट होंगे और अनादिकाल के जन्म, जरा, मरण, वेदना, भयंकर वेदना, कर्कश वेदना प्रतिकुल संयोग, दानांतराय, लाभांतराय, भोगांतराय, उपभोगांतराय, वीर्यान्तराय सभी गाढे चिकने कर्म प्रकृती के बंधनों का क्षय होगा ।


हमें पूरा विश्वास है कि जिनके चरणों में हम समर्पित होंगे वैसे ही हम बनेंगे, अरिहंतों का शरण लिया तो अरिहंत बन सकते, सिद्ध प्रभु का शरण लिया तो सिद्ध प्रभु जैसे बनेंगे, केवली भगवान के शरण में गये तो केवली भगवान जैसे बनेंगे, साधु संतों के शरणो में जाने से साधु संत जैसे बनेंगे, अर्थात् आपके जैसी चमकती दमकती ज्योत प्रगट करने के लिये, परम ज्ञान, परम दर्शन, परम चारित्र, परम सुख, परम शांति, परम आनंद प्राप्ति के लिये।


सकल विश्व मे नारकीय, तिर्यंच, और देवताओं में से मैने मेरे पूर्व भवों में वथा वर्तमान जीवन में आज तक किसी भी जीव को हणाया हो, परिताप उपजाया हो या कोई भी प्रकार का दुख जानते अजानते दिया हो और किसी भी जीव के साथ मन योग, वचन-योग, काय योग से वैर विरोध हुआ हो उन सबके साथ मैं क्षमापना करता हूँ। मेरा किसी भी जीव के साथ वैर-विरोध नहीं और विश्व के सर्व जीवों के साथ मेरा संपूर्ण मैत्री भाव है। इसी भरत क्षेत्र में हुए श्री ऋषभदेव वगैरह वर्तमान अवसर्पिणी दरम्यान के तीर्थंकर भगवंतों को मैं त्रिकरण योग से वंदन करता हूँ। इस उपरान्त बाह्य आभ्यन्तर तप करने के लिए अनुकूलता होते हुए भी उभय प्रकार के तप की आराधना करने से मैं वंचित रहा। मैं अपनी प्रमाद प्रवृत्ति का मिच्छामी दुक्कड़म देता हूं ।

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